छत्तीसगढ़ की लोक कलाओं में पंडवानी का स्थान सबसे ऊँचा है। यह केवल गायन नहीं — कथा, अभिनय, संगीत और नाटक का ऐसा मेल है जिसमें एक अकेला कलाकार पूरे महाभारत को मंच पर जीवित कर देता है। CGPSC, CGSSB और व्यापम की परीक्षाओं में छत्तीसगढ़ की लोक कला एवं संस्कृति एक निश्चित खंड है, और पंडवानी उसमें सबसे अधिक पूछा जाने वाला विषय है।
पंडवानी क्या है
“पंडवानी” का शाब्दिक अर्थ है पांडवों की कथा — “पंडव” + “वाणी”। इसमें कलाकार महाभारत के प्रसंगों को छत्तीसगढ़ी भाषा में गाकर सुनाता है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह संस्कृत महाभारत का सीधा अनुवाद नहीं है। इसका आधार माना जाता है सबल सिंह चौहान कृत महाभारत, और इसमें लोक परंपरा की अपनी व्याख्याएँ जुड़ी हैं। सबसे बड़ा अंतर यह है कि यहाँ भीम प्रायः सर्वप्रमुख नायक के रूप में उभरते हैं — अर्जुन या युधिष्ठिर नहीं। लोक परंपरा में शक्ति और सरलता के प्रतीक भीम आम जन के अधिक निकट माने जाते हैं।
तंबूरा — वाद्य भी, प्रतीक भी
पंडवानी कलाकार के हाथ में रहता है तंबूरा। लेकिन यह केवल वाद्ययंत्र नहीं होता — यही पंडवानी की सबसे बड़ी नाट्य-कुशलता है।
कथा के दौरान वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता है, कभी अर्जुन का धनुष, कभी रथ, कभी पर्वत। कलाकार के हाथ की एक भंगिमा से वस्तु का अर्थ बदल जाता है। बिना किसी सेट या प्रॉप्स के, केवल एक तंबूरे और अभिनय से पूरा युद्ध दृश्य खड़ा कर देना — यही इस विधा का कौशल है।
साथ में रागी (सह-गायक) होते हैं, जो ढोलक, मंजीरा, तबला और हारमोनियम के साथ संगत करते हैं। रागी केवल संगतकार नहीं होता — वह बीच-बीच में कलाकार से प्रश्न पूछता है, टोकता है, जिससे कथा में संवाद और हास्य दोनों आते हैं।
दो शैलियाँ — परीक्षा का सबसे बड़ा प्रश्न
| शैली | विशेषता | प्रमुख कलाकार |
|---|---|---|
| कापालिक | कलाकार खड़े होकर प्रस्तुति देता है; अभिनय, गति और नाटकीयता अधिक; ऊर्जावान प्रस्तुति | तीजन बाई |
| वेदमती | कलाकार बैठकर शांत भाव से कथा कहता है; ज़ोर गायन एवं कथन पर | झाड़ूराम देवांगन |
यह विभाजन परीक्षा में सबसे अधिक पूछा जाता है — कापालिक = खड़े होकर, वेदमती = बैठकर। इसे इसी जोड़ी में याद रखें।
तीजन बाई — पंडवानी का वैश्विक चेहरा
पंडवानी का नाम आते ही तीजन बाई का चेहरा सामने आता है। दुर्ग ज़िले के गनियारी गाँव से निकलकर उन्होंने इस लोक कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया।
उनकी गूँजती आवाज़, आँखों का अभिनय और मंच पर मौजूदगी ने पंडवानी को नई ऊँचाई दी। वे कापालिक शैली की सबसे प्रसिद्ध कलाकार थीं।

विस्तार से पढ़ें: तीजन बाई (1956–2026) — जीवन, सम्मान और विरासत
सम्मान: उन्हें पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण — तीनों से सम्मानित किया जा चुका है, साथ ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला है। परीक्षा में यह क्रम पूछा जा सकता है।
सामाजिक दृष्टि से उनका महत्व और बड़ा है। जिस समय यह कला मुख्यतः पुरुष कलाकारों तक सीमित मानी जाती थी, उस समय एक महिला का मंच पर खड़े होकर प्रस्तुति देना अपने आप में एक बड़ा सामाजिक बदलाव था।
अन्य प्रमुख कलाकार
- झाड़ूराम देवांगन — वेदमती शैली के प्रसिद्ध कलाकार; पंडवानी के पितामह माने जाते हैं। तीजन बाई को प्रशिक्षण उमेद सिंह देशमुख से मिला, जबकि देवांगन जी का प्रभाव उन पर रहा।
- ऋतु वर्मा — पंडवानी की महत्वपूर्ण महिला कलाकार
- शांतिबाई चेलक — इस परंपरा की अन्य उल्लेखनीय कलाकार
- उषा बारले — पंडवानी एवं लोक गायन में योगदान
प्रस्तुति का स्वरूप
- मंच सादा — कोई भारी सेट या साज-सज्जा नहीं
- कलाकार पारंपरिक परिधान और भारी आभूषणों में
- कथा घंटों चल सकती है; दर्शक बीच-बीच में प्रतिक्रिया देते हैं
- भाषा छत्तीसगढ़ी — जिससे कथा सीधे लोगों तक पहुँचती है
- प्रायः रात में, खुले मंच या गाँव के चौक में आयोजन
छत्तीसगढ़ की अन्य लोक विधाएँ
पंडवानी के साथ इन विधाओं को भी जोड़कर याद रखें, क्योंकि प्रश्न प्रायः तुलनात्मक होते हैं:
| विधा | स्वरूप |
|---|---|
| पंथी | सतनामी समाज का नृत्य; गुरु घासीदास से संबंधित |
| राउत नाचा | यादव समुदाय का नृत्य; देव उठनी एकादशी पर |
| करमा | आदिवासी नृत्य; करम वृक्ष की पूजा से जुड़ा |
| सुआ | महिलाओं का नृत्य; सुआ (तोता) प्रतीक; दीपावली के आसपास |
| ददरिया | प्रश्नोत्तर शैली का लोकगीत; प्रायः युगल गायन |
| नाचा | पारंपरिक लोक नाट्य विधा |
पंडवानी की कथा संरचना
पंडवानी की प्रस्तुति एक निश्चित क्रम में चलती है:
- वंदना — सरस्वती, गणेश एवं ग्राम देवता की स्तुति से आरंभ
- कथा प्रवेश — प्रसंग की भूमिका
- मुख्य प्रसंग — गायन, अभिनय एवं संवाद
- रागी संवाद — बीच-बीच में प्रश्नोत्तर एवं हास्य
- समापन — शिक्षा एवं आशीर्वाद
लोकप्रिय प्रसंगों में द्रौपदी चीरहरण, भीम-दुर्योधन गदा युद्ध, कीचक वध और लाक्षागृह प्रमुख हैं।
छत्तीसगढ़ की अन्य लोक गाथाएँ
पंडवानी अकेली लोक गाथा नहीं है। परीक्षा में इन्हें एक साथ पूछा जाता है:
| गाथा | विषय |
|---|---|
| पंडवानी | महाभारत की कथा |
| भरथरी | राजा भर्तृहरि की वैराग्य कथा; प्रायः महिलाओं द्वारा गाई जाती है |
| चंदैनी | लोरिक-चंदा की प्रेम गाथा |
| ढोला-मारू | प्रेम गाथा |
| नाचा | लोक नाट्य विधा; सामाजिक व्यंग्य |
भरथरी की प्रसिद्ध गायिका के रूप में सुरुज बाई खांडे का नाम लिया जाता है।
वेशभूषा और मंच
- पारंपरिक साड़ी अथवा धोती-कुर्ता; भारी आभूषण
- गले में मालाएँ, माथे पर तिलक
- हाथ में तंबूरा, जिस पर प्रायः मोर पंख अथवा रंगीन सजावट
- मंच पर बैठने की व्यवस्था — रागी एवं वादक कलाकार के पीछे
पंडवानी का सामाजिक पक्ष
पंडवानी परंपरागत रूप से समाज के उन वर्गों से आई जिन्हें शास्त्रीय कला परंपरा में स्थान नहीं मिलता था। यह विधा गाँव के चौक की कला थी, दरबार की नहीं। इसीलिए इसकी भाषा, इसका हास्य और इसके नायक — सब आम जन के क़रीब हैं।
तीजन बाई का उभरना इस अर्थ में दोहरा बदलाव था — जाति और लिंग, दोनों की दीवारें एक साथ टूटीं। मुख्य परीक्षा के सामाजिक न्याय अथवा संस्कृति खंड में यह बिंदु उपयोगी है।
संरक्षण के प्रयास
टेलीविज़न और मोबाइल के दौर में हर लोक कला की तरह पंडवानी के सामने भी दर्शक और नए कलाकार जुटाने की चुनौती है। सांस्कृतिक महोत्सवों, इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ जैसे संस्थानों और लोक कला अकादमियों के प्रयासों से नई पीढ़ी इस विधा की ओर लौट रही है।
खैरागढ़ स्थित यह विश्वविद्यालय भारत का पहला संगीत एवं कला विश्वविद्यालय माना जाता है — यह तथ्य स्वयं में परीक्षा का प्रश्न है।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
CGPSC / CGSSB / व्यापम — याद रखने योग्य बिंदु
- पंडवानी — महाभारत की कथा का छत्तीसगढ़ी में गायन एवं अभिनय
- दो शैलियाँ — कापालिक (खड़े होकर) एवं वेदमती (बैठकर)
- तीजन बाई — कापालिक शैली; गाँव गनियारी, दुर्ग ज़िला; निधन 5 जुलाई 2026 (एम्स रायपुर, आयु 70 वर्ष)
- तीजन बाई को पद्म श्री, पद्म भूषण एवं पद्म विभूषण — तीनों सम्मान
- झाड़ूराम देवांगन — वेदमती शैली; पंडवानी के पितामह | तीजन बाई का प्रशिक्षण उमेद सिंह देशमुख से
- मुख्य वाद्य — तंबूरा; सहयोगी गायक — रागी
- कथा का आधार — सबल सिंह चौहान कृत महाभारत
- प्रमुख नायक — भीम
- अन्य लोक गाथाएँ — भरथरी (भर्तृहरि), चंदैनी (लोरिक-चंदा), ढोला-मारू
- सुरुज बाई खांडे — भरथरी गायन की प्रसिद्ध कलाकार
- इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ — भारत का पहला संगीत एवं कला विश्वविद्यालय
संभावित प्रश्न
प्र. पंडवानी की दो शैलियाँ कौन-सी हैं?
उ. कापालिक और वेदमती
प्र. तीजन बाई किस शैली की कलाकार थीं?
उ. कापालिक शैली
प्र. पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन कब हुआ?
उ. 5 जुलाई 2026 को रायपुर एम्स में, 70 वर्ष की आयु में
प्र. पंडवानी में प्रयुक्त प्रमुख वाद्ययंत्र कौन-सा है?
उ. तंबूरा
प्र. पंडवानी में सहगायक को क्या कहा जाता है?
उ. रागी
प्र. पंडवानी में प्रमुख नायक के रूप में किसे चित्रित किया जाता है?
उ. भीम
निष्कर्ष
पंडवानी छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी सांस्कृतिक पूँजी में से एक है। यह याद दिलाती है कि महाकाव्य केवल किताबों में नहीं रहते — वे लोगों की ज़ुबान पर, उनकी लय में और उनके मंच पर ज़िंदा रहते हैं। परीक्षार्थियों के लिए यह अध्याय राज्य की सांस्कृतिक पहचान समझने का सबसे अच्छा प्रवेश द्वार है।





