छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा चेहरा अब नहीं रहा। पंडवानी की सुप्रसिद्ध गायिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई का 5 जुलाई 2026 को रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और 27 मई 2026 से अस्पताल में भर्ती थीं।
प्रधानमंत्री सहित देश-प्रदेश के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने शोक व्यक्त किया। उनके निधन के साथ पंडवानी की वह परंपरा एक युग के अंत तक पहुँची, जिसे उन्होंने गाँव के चौक से उठाकर विश्व के मंचों तक पहुँचाया था।

गनियारी से शुरुआत
तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को दुर्ग ज़िले के गनियारी गाँव में हुआ, जो भिलाई से लगभग 14 किलोमीटर उत्तर में है। उनके पिता का नाम चुनुक लाल पारधी और माता का नाम सुखवती था। वे पारधी जनजातीय समुदाय से आती थीं।
पंडवानी से उनका पहला परिचय घर में ही हुआ। उनके नाना बृजलाल पारधी छत्तीसगढ़ी लेखक सबल सिंह चौहान कृत महाभारत का पाठ किया करते थे — बालिका तीजन उसे सुनकर याद कर लेती थीं। यहीं से इस कला के प्रति उनका लगाव बना।
13 वर्ष की आयु और दस रुपये
उनकी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति मात्र 13 वर्ष की आयु में पड़ोस के गाँव चंद्रखुरी में हुई, जिसके लिए उन्हें दस रुपये मिले थे। यह छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर एक ऐतिहासिक यात्रा में बदली।
प्रशिक्षण के संदर्भ में उमेद सिंह देशमुख का नाम लिया जाता है, जिन्होंने उनकी प्रतिभा पहचानकर उन्हें सिखाया। वहीं झाड़ूराम देवांगन — जिन्हें पंडवानी का पितामह माना जाता है — का प्रभाव भी उन पर रहा।
सबसे बड़ा साहस — खड़े होकर गाना
तीजन बाई का सबसे बड़ा योगदान केवल गायन नहीं, एक सामाजिक परंपरा को तोड़ना था।
पंडवानी की दो शैलियाँ हैं — वेदमती, जिसमें कलाकार बैठकर शांत भाव से कथा कहता है, और कापालिक, जिसमें खड़े होकर अभिनय के साथ प्रस्तुति दी जाती है। परंपरागत रूप से महिलाएँ वेदमती शैली में ही गाती थीं; कापालिक शैली पुरुषों तक सीमित मानी जाती थी।
तीजन बाई ने यह दीवार तोड़ी। उन्होंने खड़े होकर, कापालिक शैली में गाना शुरू किया — पूरी ऊर्जा, गूँजती आवाज़ और नाटकीय अभिनय के साथ। एक जनजातीय समुदाय की महिला का यह क़दम उस दौर में असाधारण था।
हबीब तनवीर और वह मोड़
उनके जीवन का निर्णायक मोड़ तब आया जब रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समक्ष प्रस्तुति का अवसर दिलाया। यहीं से राष्ट्रीय पहचान की शुरुआत हुई।
दिलचस्प है कि हबीब तनवीर स्वयं छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को आधुनिक रंगमंच तक लाने वाले व्यक्ति थे — यानी दो बड़ी सांस्कृतिक धाराएँ यहाँ मिलती हैं।
विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ी
1980 के दशक से वे सांस्कृतिक राजदूत के रूप में विदेश यात्राओं पर गईं। जिन देशों में उन्होंने प्रस्तुति दी उनमें शामिल हैं — इंग्लैंड, फ़्रांस, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, तुर्की, ट्यूनीशिया, माल्टा, साइप्रस, रोमानिया और मॉरीशस।
उन्होंने श्याम बेनेगल के दूरदर्शन धारावाहिक “भारत एक खोज” में महाभारत के प्रसंगों की प्रस्तुति भी दी।
ध्यान देने योग्य है कि वे मंच पर छत्तीसगढ़ी में गाती थीं — और विदेशी दर्शक भाषा न समझते हुए भी उनके अभिनय और आवाज़ से बँध जाते थे।
सम्मान एवं पुरस्कार
| वर्ष | सम्मान |
|---|---|
| 1988 | पद्म श्री |
| 1995 | संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार |
| 2003 | पद्म भूषण; बिलासपुर विश्वविद्यालय से मानद डी.लिट्. |
| 2016 | एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार |
| 2018 | फुकुओका पुरस्कार (जापान) |
| 2019 | पद्म विभूषण; संगीत नाटक अकादमी फ़ेलोशिप |
पद्म विभूषण भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। किसी लोक कलाकार का इस स्तर तक पहुँचना उल्लेखनीय है — और तीनों पद्म सम्मान (श्री, भूषण, विभूषण) प्राप्त करना और भी दुर्लभ।
आयु को लेकर स्पष्टीकरण
उनकी विरासत
तीजन बाई के बाद पंडवानी के सामने वही प्रश्न है जो हर लोक कला के सामने है — नई पीढ़ी इसे कितना अपनाएगी। ऋतु वर्मा, शांतिबाई चेलक और उषा बारले जैसी कलाकारों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है, पर तीजन बाई जैसी वैश्विक पहचान अभी किसी को नहीं मिली।
उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद यह है कि उन्होंने सिद्ध किया — लोक कला हीन नहीं होती। एक गाँव की बोली, एक तंबूरा और एक आवाज़ अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतनी ही गरिमा रख सकती है जितनी कोई शास्त्रीय परंपरा।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
CGPSC / CGSSB / व्यापम — याद रखने योग्य बिंदु
- तीजन बाई — जन्म 8 अगस्त 1956, गनियारी गाँव, दुर्ग ज़िला
- निधन — 5 जुलाई 2026, एम्स रायपुर (आयु 69 वर्ष)
- समुदाय — पारधी जनजाति
- विधा — पंडवानी; शैली — कापालिक (खड़े होकर)
- कापालिक शैली में गाने वाली प्रथम प्रमुख महिला कलाकार
- प्रशिक्षण — उमेद सिंह देशमुख; प्रभाव — झाड़ूराम देवांगन (पंडवानी के पितामह)
- प्रथम प्रस्तुति — 13 वर्ष की आयु, गाँव चंद्रखुरी, पारिश्रमिक 10 रुपये
- राष्ट्रीय पहचान दिलाने में हबीब तनवीर की भूमिका
- पद्म श्री 1988 · पद्म भूषण 2003 · पद्म विभूषण 2019
- संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार 1995; फ़ेलोशिप 2019; फुकुओका पुरस्कार 2018
- कथा का आधार — सबल सिंह चौहान कृत महाभारत
संभावित प्रश्न
प्र. पंडवानी गायिका तीजन बाई का निधन कब और कहाँ हुआ?
उ. 5 जुलाई 2026 को एम्स, रायपुर में
प्र. तीजन बाई का जन्म कहाँ हुआ था?
उ. गनियारी गाँव, दुर्ग ज़िला (जन्म 8 अगस्त 1956)
प्र. तीजन बाई को पद्म विभूषण किस वर्ष मिला?
उ. 2019
प्र. तीजन बाई किस जनजातीय समुदाय से थीं?
उ. पारधी
प्र. तीजन बाई को 2018 में कौन-सा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला?
उ. फुकुओका पुरस्कार (जापान)
चित्र एवं स्रोत
- मुखपृष्ठ चित्र — राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से पद्म विभूषण ग्रहण करतीं तीजन बाई (2019)। चित्र: राष्ट्रपति सचिवालय / प्रेस सूचना ब्यूरो, GODL-India के अंतर्गत।
- प्रस्तुति चित्र — Suyash Dwivedi, CC BY-SA 4.0, विकिमीडिया कॉमन्स। दोनों चित्रों का आकार बदला गया है।
निष्कर्ष
तीजन बाई का जाना छत्तीसगढ़ के लिए केवल एक कलाकार का जाना नहीं है। वे उस आत्मविश्वास का प्रतीक थीं जो अपनी भाषा, अपनी परंपरा और अपनी ज़मीन पर टिका होता है। परीक्षार्थियों के लिए उनके जीवन की तिथियाँ और सम्मान याद रखना आवश्यक है — पर उससे अधिक ज़रूरी है यह समझना कि एक लोक कला को विश्व तक पहुँचाने में एक व्यक्ति कितना बड़ा अंतर ला सकता है।





