छत्तीसगढ़ के जंगलों की रखवाली अब तकनीक के हाथों में भी आ रही है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम का ट्रायल शुरू किया गया है — एक ऐसी व्यवस्था जो अपने आप बाघ, हाथी, तेंदुए और भालू को पहचान लेगी, और शिकारी या लकड़ी तस्कर दिखते ही वन कर्मियों को व्हाट्सएप पर तुरंत अलर्ट भेज देगी।
जनसंपर्क संचालनालय के अनुसार यह पहल मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में शुरू की गई है। यह व्यवस्था वन्यजीवों की सुरक्षा, मानव-हाथी संघर्ष की रोकथाम और वन अपराधों पर प्रभावी नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
पृष्ठभूमि: उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व है क्या
यह समझने के लिए कि यह खबर बड़ी क्यों है, पहले जगह को जानना ज़रूरी है।
उदंती-सीतानदी छत्तीसगढ़ के चार प्रोजेक्ट टाइगर स्थलों में से एक है। यह दो अलग-अलग संरक्षित क्षेत्रों को मिलाकर बना है:
- सीतानदी वन्यजीव अभयारण्य — धमतरी जिले में, 1974 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत स्थापित, क्षेत्रफल लगभग 556 वर्ग किलोमीटर।
- उदंती वन्यजीव अभयारण्य — गरियाबंद जिले में।
इन दोनों को मिलाकर 2008–09 में टाइगर रिजर्व अधिसूचित किया गया। इसका कोर क्षेत्र लगभग 851 वर्ग किमी और बफर क्षेत्र लगभग 991 वर्ग किमी है — यानी कुल मिलाकर लगभग 1,842 वर्ग किलोमीटर का विशाल इलाका।
उदंती की एक और खास पहचान है: यह देश के उन गिने-चुने ठिकानों में है जहाँ दुर्लभ वन भैंसा (Wild Water Buffalo) अब भी बचा हुआ है — छत्तीसगढ़ में इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के साथ। इसकी घटती आबादी को संभालने के लिए 2023 में चार वन भैंसे उदंती-सीतानदी में स्थानांतरित किए गए थे।
इतने बड़े और दुर्गम इलाके की निगरानी सीमित वन अमले से करना कितना कठिन है — यही वह समस्या है जिसे यह नई तकनीक हल करने की कोशिश कर रही है।
स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम है क्या
जनसंपर्क संचालनालय के लेख के अनुसार, स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम एक उन्नत सुरक्षा निगरानी तकनीक है, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और क्लाउड कंप्यूटिंग का उपयोग करती है।
पारंपरिक सीसीटीवी से इसका फर्क बुनियादी है: यह केवल रिकॉर्डिंग नहीं करता। यह असामान्य गतिविधियों, चेहरों और संदिग्ध हरकतों को पहचानकर वास्तविक समय (real-time) में अलर्ट भेजता है। वन क्षेत्रों में यह तकनीक कैमरा ट्रैप, ड्रोन और सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके जानवरों की गिनती, अवैध शिकार और वनों की कटाई की पहचान करने में मदद करती है।
कैसे काम करेगी यह व्यवस्था

| पहलू | विवरण |
|---|---|
| टावर | 70 से 80 फीट ऊंचे टावरों पर AI कैमरे |
| कनेक्टिविटी | पीयर-टू-पीयर (P2P) वायरलेस सिस्टम |
| निगरानी | दूरस्थ और दुर्गम जंगलों में भी चौबीसों घंटे |
| पहचान | हाथी, बाघ, तेंदुआ और भालू की स्वतः पहचान |
| संदिग्ध गतिविधि | शिकारी, लकड़ी तस्कर, अवैध घुसपैठ की पहचान |
| ध्वनि पहचान | शिकारी गतिविधियों और पेड़ों की अवैध कटाई की आवाज़ सुनकर तुरंत अलर्ट |
| अलर्ट माध्यम | व्हाट्सएप के जरिए वन कर्मियों व अधिकारियों को |
| लागत | प्रति टावर (कैमरा, P2P कनेक्टिविटी व अन्य संरचना सहित) लगभग ₹2.5 से 3 लाख |
एक और बड़ी बात — बाघ या हाथियों के रिहायशी इलाकों के पास आने पर सिस्टम वन विभाग को तुरंत सूचना देगा। मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने में यही सबसे काम की चीज़ साबित हो सकती है।
किन इलाकों में हो रहा है ट्रायल
स्मार्ट सर्विलांस सिस्टम का ट्रायल इन रेंजों में किया जा रहा है:
- कुल्हाड़ीघाट
- इंदागांव
- रिसगांव
- दक्षिण उदंती
- पायलीखण्ड (उत्तर उदंती)
ये क्षेत्र चुने जाने की एक ठोस वजह है — ये हाथियों और अन्य वन्यजीवों के प्रमुख आवागमन मार्ग हैं, और अवैध शिकार, लकड़ी तस्करी तथा अतिक्रमण की दृष्टि से संवेदनशील माने जाते हैं।
P2P तकनीक — जंगल में इंटरनेट पहुँचाने की चाबी
दुर्गम वन क्षेत्रों में सबसे बड़ी दिक्कत नेटवर्क की होती है। इसी को हल करने के लिए पीयर-टू-पीयर (P2P) वायरलेस तकनीक का उपयोग किया जा रहा है, जिससे दूरस्थ इलाकों में भी इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाएगी। इससे एंटी-पोचिंग कैंपों और वन चौकियों तक लाइव वीडियो और रियल-टाइम निगरानी संभव हो सकेगी।
P2P का अर्थ है ‘पीयर-टू-पीयर’ या ‘पॉइंट-टू-पॉइंट’ — यानी सीधा कनेक्शन। इसमें किसी केंद्रीय सर्वर या बीच के माध्यम की जरूरत नहीं होती; दो या दो से अधिक डिवाइस या स्थान सीधे आपस में जुड़कर डेटा साझा करते हैं।
‘फोर्स मल्टीप्लायर’ — कम अमले की सबसे बड़ी चुनौती का जवाब
वन विभाग में सीमित मानव संसाधन की चुनौती को देखते हुए यह AI प्रणाली फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में काम करेगी। यानी अमला उतना ही रहेगा, लेकिन उसकी पहुँच और क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी — गश्त की क्षमता बढ़ेगी, निगरानी मजबूत होगी और संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी।
पहले से क्या हो रहा था, और अब तक का रिकॉर्ड
यह पहला तकनीकी कदम नहीं है। उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व पहले से ही थर्मल ड्रोन, उपग्रह चित्रों और भू-स्थानिक (geospatial) तकनीक का उपयोग कर रहा है। नई AI प्रणाली इन्हीं प्रयासों को और प्रभावी बनाएगी।
रिजर्व का अब तक का रिकॉर्ड भी बताता है कि ज़मीन पर काम हुआ है — जनसंपर्क संचालनालय के अनुसार पिछले चार वर्षों में:
- 956 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया
- 500 से अधिक तस्करों व शिकारियों की गिरफ्तारी हुई
- बेहतर संरक्षण के कारण यहाँ कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों का सफल दस्तावेजीकरण भी हुआ
मध्य भारत के लिए एक मॉडल?
विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना मध्य भारत में AI आधारित वन और वन्यजीव संरक्षण की सबसे उन्नत पहलों में से एक है। भविष्य में यह मॉडल देश के अन्य संरक्षित क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।
प्रति टावर लगभग ढाई से तीन लाख रुपये का खर्च देखने में छोटा लगता है, लेकिन 1,800 वर्ग किलोमीटर से बड़े इलाके में फैलाने पर यह निवेश वन सुरक्षा, वन्यजीव संरक्षण और तकनीक आधारित निगरानी व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में एक अहम कदम है।
जैसा कि जनसंपर्क संचालनालय के लेख में लिखा है — यह पहल केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि वन, वन्यजीव और वनांचल में रहने वाले लोगों की सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक दूरदर्शी और प्रभावी प्रयास है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व कहाँ है?
छत्तीसगढ़ में — सीतानदी अभयारण्य धमतरी जिले में और उदंती अभयारण्य गरियाबंद जिले में है। दोनों को मिलाकर 2008–09 में टाइगर रिजर्व अधिसूचित किया गया।
AI कैमरे किन जानवरों को पहचान सकेंगे?
हाथी, बाघ, तेंदुआ और भालू जैसे प्रमुख वन्यजीवों की स्वतः पहचान की क्षमता बताई गई है।
अलर्ट कैसे मिलेगा?
किसी वन्यजीव या संदिग्ध व्यक्ति की पहचान होते ही सिस्टम व्हाट्सएप के माध्यम से वन कर्मियों और अधिकारियों को तुरंत अलर्ट भेजेगा।
ट्रायल किन रेंजों में चल रहा है?
कुल्हाड़ीघाट, इंदागांव, रिसगांव, दक्षिण उदंती और पायलीखण्ड (उत्तर उदंती) रेंज में।
एक टावर पर कितना खर्च आएगा?
प्रत्येक टावर, AI कैमरा, P2P कनेक्टिविटी और अन्य आवश्यक संरचनाओं पर लगभग ₹2.5 से 3 लाख।
स्रोत: छत्तीसगढ़ जनसंपर्क संचालनालय का विशेष लेख — dprcg.gov.in. पृष्ठभूमि के आंकड़े (क्षेत्रफल, स्थापना वर्ष, वन भैंसा) सार्वजनिक विश्वकोश स्रोतों से।





