राउत नाचा: देव उठनी एकादशी पर सजने वाला छत्तीसगढ़ का लोकनृत्य

राउत नाचा लोकनृत्य पर लेख का आवरण चित्र

दिवाली के कुछ दिन बाद छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और रायपुर अंचल में सड़कों पर ढोल की गूँज, चमकीले परिधान और लाठियों की ताल पर थिरकते समूह दिखाई देते हैं। यह है राउत नाचा — राज्य के सबसे जीवंत लोकनृत्यों में से एक। परीक्षा की दृष्टि से यह छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति खंड का महत्वपूर्ण अध्याय है।

कौन करते हैं यह नृत्य

राउत नाचा मुख्यतः यादव (राउत) समुदाय का पारंपरिक नृत्य है। यह समुदाय पारंपरिक रूप से गोपालन एवं पशुपालन से जुड़ा रहा है और स्वयं को कृष्ण की गोप परंपरा से जोड़कर देखता है। नृत्य में कृष्ण-लीला और गोवर्धन प्रसंग की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।

अवसर — देव उठनी एकादशी

इसका मुख्य अवसर है देव उठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी), जो दीपावली के लगभग ग्यारह दिन बाद आती है। मान्यता है कि इसी दिन देव चार माह की निद्रा से जागते हैं और विवाह आदि शुभ कार्यों का मौसम आरंभ होता है।

इस अवसर पर राउत समुदाय के लोग सज-धज कर निकलते हैं, घर-घर और गाँव-गाँव जाकर नृत्य करते हैं और परिवारों को आशीर्वाद देते हैं। बदले में उन्हें भेंट दी जाती है। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं — यह एक सामाजिक और आशीर्वाद परंपरा है।

छत्तीसगढ़ में इस अवधि को “मातर” भी कहा जाता है, जिसमें गोवर्धन पूजा और पशुधन से जुड़े अनुष्ठान होते हैं।

वेशभूषा — नृत्य का आधा आकर्षण

राउत नाचा की पहचान उसकी भव्य और भड़कीली वेशभूषा है:

  • पगड़ी — मोर पंख, रंगीन कपड़ों, शीशों और चमकीली सजावट से सजी ऊँची पगड़ी
  • लाठी — सजी हुई लाठी, जो नृत्य का मुख्य उपकरण है; लाठी की ताल ही नृत्य की लय बनाती है
  • घुंघरू — पैरों में बँधे घुंघरू
  • आभूषण — गले, बाँहों और कमर में भारी पारंपरिक आभूषण
  • रंगीन जैकेट एवं धोती — चटख रंगों में परिधान

कुछ प्रस्तुतियों में कलाकार ढाल एवं लाठी के साथ युद्ध-कौशल जैसी भंगिमाएँ भी दिखाते हैं, जिससे नृत्य में वीर रस आता है।

दोहा — नृत्य के भीतर की कविता

राउत नाचा केवल शरीर का नृत्य नहीं है। इसमें कलाकार बीच-बीच में दोहे कहते हैं, और यही इस विधा की आत्मा है।

ये दोहे कई प्रकार के होते हैं:

  • भक्ति के — कृष्ण एवं गोवर्धन से जुड़े
  • नीति एवं उपदेश के — जीवन और व्यवहार की सीख
  • हास्य एवं व्यंग्य के — समाज और रिश्तों पर तीखी टिप्पणी
  • आशीर्वाद के — जिस घर में नृत्य हो, उस परिवार के लिए

दोहा कहने की कला ही किसी कलाकार को श्रेष्ठ बनाती है — यही राउत नाचा को एक जीवंत, समकालीन अभिव्यक्ति बनाए रखती है।

वाद्ययंत्र

वाद्ययंत्र भूमिका
गड़वा बाजा पारंपरिक वाद्य समूह — राउत नाचा की मुख्य पहचान
ढोल / निशान गहरी एवं तेज़ ताल; दूर तक सुनाई देती है
मोहरी शहनाई जैसा सुर देने वाला वाद्य
टिमकी तीखी ताल
मंजीरा लय को चमक देता है

गड़वा बाजा छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध पारंपरिक वाद्य समूह है — यह नाम परीक्षा में पूछा जा चुका है।

बिलासपुर का राउत नाचा महोत्सव

बिलासपुर में हर वर्ष होने वाला राउत नाचा महोत्सव इस कला का सबसे बड़ा आयोजन माना जाता है। यहाँ अलग-अलग गाँवों और टोलियों के दल जुटते हैं और बड़ी संख्या में कलाकार एक साथ नृत्य करते हैं। यह आयोजन इस लोक परंपरा को एक सामूहिक उत्सव में बदल देता है और इसे राज्य स्तर पर पहचान दिलाता है।

सांस्कृतिक महत्व

राउत नाचा एक समुदाय की सामाजिक पहचान, उसकी आस्था और उसकी अभिव्यक्ति — तीनों को एक साथ सामने रखता है। खेती और पशुपालन के वार्षिक चक्र से जुड़ा यह उत्सव दिखाता है कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति उसकी ज़मीन और उसके काम से कितनी गहराई से जुड़ी है। फ़सल कटने के बाद का समय, पशुधन की पूजा और आशीर्वाद की परंपरा — सब एक ही चक्र के हिस्से हैं।

मातर — राउत नाचा का बड़ा संदर्भ

राउत नाचा को अकेले नहीं, मातर पर्व के हिस्से के रूप में समझना चाहिए। दीपावली के बाद यादव समुदाय गोवर्धन पूजा और पशुधन से जुड़े अनुष्ठान करता है। इस दौरान:

  • सोहई बाँधना — गाय-बैलों के गले में सजावटी सोहई बाँधी जाती है
  • गोवर्धन पूजा — गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाकर पूजा
  • मातर मड़ई — सामूहिक मेला एवं नृत्य
  • घर-घर आशीर्वाद — दोहे के साथ परिवारों को शुभकामना

यानी यह केवल नृत्य नहीं, फ़सल कटने के बाद का पूरा कृषि-पशुपालन उत्सव चक्र है।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकनृत्य — तुलनात्मक तालिका

परीक्षा में प्रश्न प्रायः “कौन-सा नृत्य किस समुदाय/अवसर का” रूप में आते हैं:

नृत्य समुदाय / क्षेत्र अवसर / विशेषता
राउत नाचा यादव (राउत) देव उठनी एकादशी; लाठी एवं दोहा
पंथी सतनामी समाज गुरु घासीदास जयंती; तेज़ लय, मानव पिरामिड
करमा आदिवासी (गोंड, बैगा, उराँव) करम वृक्ष की पूजा; वर्षा ऋतु के बाद
सुआ महिलाएँ (विशेषतः गोंड) सुआ (तोता) प्रतीक; दीपावली के आसपास
सैला बैगा एवं अन्य जनजातियाँ डंडा नृत्य; फ़सल कटाई के बाद
गेंड़ी बस्तर की जनजातियाँ बाँस की गेंड़ी पर; वर्षा ऋतु
बिसन हॉर्न मारिया अबूझमाड़िया (बस्तर) भैंसे के सींग का शिरोवेश

इस तालिका को एक साथ याद रखना सबसे प्रभावी रणनीति है।

दोहे का स्वरूप

राउत नाचा के दोहे मौखिक परंपरा से आते हैं और कलाकार अवसर के अनुसार उन्हें बदलता है। इनकी विषय-वस्तु:

  • कृष्ण एवं गोवर्धन की स्तुति
  • गृहस्वामी के लिए आशीर्वाद एवं समृद्धि की कामना
  • सामाजिक व्यवहार पर नीति एवं उपदेश
  • समकालीन विषयों पर हल्का व्यंग्य

दोहा कहने की कला ही किसी कलाकार की प्रतिष्ठा तय करती है — अच्छा नर्तक होना पर्याप्त नहीं, अच्छा दोहाकार होना भी आवश्यक है।

गड़वा बाजा — विस्तार से

गड़वा बाजा कोई एक वाद्य नहीं, बल्कि एक वाद्य समूह है, जिसमें ढोल, निशान, मोहरी, टिमकी और मंजीरा शामिल होते हैं। यह छत्तीसगढ़ के अनेक लोक आयोजनों — विवाह, मड़ई और उत्सवों — में बजाया जाता है, केवल राउत नाचा में नहीं। इसे बजाने वाले कलाकारों का अपना पारंपरिक समुदाय होता है।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

CGPSC / CGSSB / व्यापम — याद रखने योग्य बिंदु

  • राउत नाचा — यादव (राउत) समुदाय का पारंपरिक लोकनृत्य
  • अवसर — देव उठनी एकादशी (दीपावली के लगभग 11 दिन बाद)
  • संबंधित पर्व — मातर (गोवर्धन पूजा एवं पशुधन से जुड़े अनुष्ठान)
  • मुख्य उपकरण — सजी हुई लाठी; सिर पर मोर पंख युक्त पगड़ी
  • प्रमुख वाद्य समूह — गड़वा बाजा; अन्य — ढोल, निशान, मोहरी, टिमकी, मंजीरा
  • नृत्य के बीच कहे जाने वाले छंद — दोहा
  • सबसे बड़ा आयोजन — बिलासपुर का राउत नाचा महोत्सव
  • धार्मिक संदर्भ — कृष्ण एवं गोवर्धन परंपरा
  • मातर पर्व — सोहई बाँधना, गोवर्धन पूजा, मातर मड़ई
  • अन्य लोकनृत्य — पंथी (सतनामी), करमा (आदिवासी), सुआ (महिलाएँ), सैला, गेंड़ी (बस्तर)
  • गड़वा बाजा — वाद्य समूह, एकल वाद्य नहीं

संभावित प्रश्न

प्र. राउत नाचा किस समुदाय का पारंपरिक नृत्य है?

उ. यादव (राउत) समुदाय

प्र. राउत नाचा मुख्यतः किस अवसर पर किया जाता है?

उ. देव उठनी एकादशी

प्र. राउत नाचा का सबसे बड़ा महोत्सव किस शहर में होता है?

उ. बिलासपुर

प्र. राउत नाचा में प्रयुक्त प्रसिद्ध पारंपरिक वाद्य समूह कौन-सा है?

उ. गड़वा बाजा

निष्कर्ष

ढोल की थाप, लाठी की ताल और दोहे की धार — राउत नाचा में छत्तीसगढ़ का वह रूप दिखता है जो किताबों में नहीं, गलियों में मिलता है। परीक्षा की तैयारी करने वालों के लिए इसे पंथी, करमा और सुआ जैसे अन्य लोकनृत्यों के साथ तुलनात्मक रूप से याद रखना सबसे उपयोगी रहेगा।